Tuesday, May 22, 2018

शत् शत् नमन सुकवि कुमार 'प्रहरी' जी -----------------------------------------------------


       आज 22 मई जालौन जनपद के  प्रिय गीतकार, अपने कवि मित्रों में 'मुक्तक सम्राट' के रूप में प्रसिद्ध, सुकवि आदर्श कुमार सक्सेना 'प्रहरी' ( मेरे अग्रज )  की पुण्य तिथि है .आज के दिन 2002 में क्रूर काल ने (हृदयाघात के कारण) उन्हें हमसे असमय ही छीन लिया था.
         उन्हें हम सभी की ओर से विनम्र श्रद्धांजलि.
  
              उनका एक गीत संग्रह ' प्यास लगी ,तो दर्द पिया है ' प्रकाशित है ,जिसे काफी सराहा गया था. इसी संग्रह  का उनका एक गीत प्रस्तुत है.

                  क्या अर्थ ऐसे त्याग का?
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क्या अर्थ ऐसे त्याग का?
क्या अर्थ ऐसे त्याग का?
              जब रूढ़ियों की तह जमी,
              उगने  न  दे  गतियाँ  नयी,
              अपमान  हो  प्राचीन  का,
              इन नयी गतियों से  कहीं?
हो 'लुप्त'यदि सौहार्द तो,
क्याअर्थ बन्धु! विरागका?
क्या अर्थ  ऐसे त्याग का?
              जब भावना की हो कमी,
              अरु, दान की भी चाह हो,
              उत्सर्ग के  आह्वान  पर,
              संसर्ग     रोके  राह   हो.
हो 'सुप्त' यदि बंधुत्व तो,
क्या अर्थ बोलो राग का ?
क्या अर्थ ऐसे त्याग  का?
               जब योगियों की भाँति तन,
               हो मन  भले ही कलुषतम,
               तो बन सकेंगें, क्या  अभी,
               उत्तम   यहाँ   ये    नराधम.
हो 'गुप्त'  यदि       संग्यान ,
तो क्या अर्थ है अनुराग का?
क्या अर्थ  ऐसे  त्याग का?
                                             
                                                       

Saturday, September 30, 2017

'मंजुल मयंक' -एक सशक्त. गीतकार

     आज बुन्देलखंड ( हमीरपुर निवासी  ) के  सुमधुर गीतकार  श्री ग़णेश प्रसाद खरे ' मंजुल मयंक' का जन्मदिवस एवम पुण्यतिथि दोनों है.मयंक जी  एक सीधे,सरल इंसान व हिंदी साहित्य के उदभट विद्वान व राष्ट्रीय स्तर के कवि रहे हैं.वे सुप्रसिद्ध कवि श्री गोपाल दास 'नीरज' के साथी रहे हैं बुंदेलखंड की इस महान विभूति को शत शत नमन.
     मेरे अग्रज स्व. आदर्श 'प्रहरी ' ने मयंक जी को निम्नांकित पंक्तियों में श्रद्धांजलि दी थी-
   "गीत में जो दर्द गाते हैं,
                                 उन्हें मेरा नमन है,
     दर्द नें जो मुस्कुराते है,
                                  उन्हें मेरा नमन है,
     जो व्यथाओं में कथाओं की ,
                                नई नित सृष्टि करते,
      मान्यताओं को बनाते हैं,
                                  उन्हें. मेरा नमन है."
   
           ऐसे युग कवि को मेरा शत शत नमन
                   
प्रस्तुत है 'मयंक 'जी का एक बेहद लोकप्रिय गीत-

       "रात ढलने लगी चॉद बुझने लगा"
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  "रात ढलने लगी, चाँद बुझने लगा,
   तुम न आए, सितारों को नींद आ गई ।

धूप की पालकी पर, किरण की दुल्हन,
आ के उतरी, खिला हर सुमन, हर चमन,
देखो बजती हैं भौरों की शहनाइयाँ,
हर गली, दौड़ कर, न्योत आया पवन,

     बस तड़पते रहे, सेज के ही सुमन,
     तुम न आए बहारों को नीद आ गई ।

व्यर्थ बहती रही, आँसुओं की नदी,
प्राण आए न तुम, नेह की नाव में,
खोजते-खोजते तुमको लहरें थकीं,
अब तो छाले पड़े, लहर के पाँव में,

      करवटें ही बदलती, नदी रह गई,
      तुम न आए किनारों को नींद आ गई ।

रात आई, महावर रचे साँझ की,
भर रहा माँग, सिन्दूर सूरज लिए,
दिन हँसा, चूडियाँ लेती अँगडाइयाँ,
छू के आँचल, बुझे आँगनों के दिये,

        बिन तुम्हारे बुझा, आस का हर दिया,
        तुम न आए सहारों को नीद आ गई ।"

👣🙌🏻🙏

Saturday, August 26, 2017

अंधभक्ति की पराकाष्ठा



            भारत में तथाकथित बाबाओं की काली करतूतों की श्रृंखला  में बाबा 'रामरहीम' का नाम आज सबसे ऊपर है . वोटों के लालच में राजनेताओं का इन बाबाओं से प्रेम जग जाहिर हो चुका है.  पंजाब व हरियाणा हाईकोर्ट के निर्देश के बाद भी उनके भक्तों को एकत्र होने देना और जैसी कि आशंका थी, कोर्ट के फैसले के बाद हिंसा होना ,सरकार की नाकामी का सूचक है. हाईकोर्ट ने पुन: सरकार को फटकार लगाते हुये कहा कि उसने राजनीतिक लाभ की दृष्टि से हिंसा होने दी.
           अब रामरहीम जेल में हैं. कोर्ट ने सरकार को उनकी संपत्ति जब्त करने व उससे हिंसा में हुये नुकसान की भरपायी करने का आदेश दिया है.
हद तो यह है कि कुछ महाराज टाइप के सांसद इन बाबा के मामले में न्यायपालिका को कोस रहे हैं. उनका कहना है कि न्यायपालिका को निर्णय देते समय जनभावनाओं का ध्यान रखना चाहिये .यह सांसद भाजपा के हैं और विवादास्पद बयान देने में माहिर हैं. बयान देते समय वे यह भी भूल गये कि इस प्रकरण की सी.बी.आई. जॉच का आदेश उनकी पार्टी के इतिहास पुरुष पूर्व प्रधानमंत्री श्रीअटल बिहारी बाजपेयी ने ही दिये थे.
            सच तो यह है कि न्यायपालिका ही इस देश के संविधान को बचाये हुये है,वरना राजनेता तो वोटों के लालच में देश का बंटाधार ही कर दें.   
            लोकप्रिय कवि प्रदीप ने छह दशक पहले  अपने गीत 'कितना बदल गया इंसान ' गीत में निम्नांकित पंक्तियॉ लिखी थीं वे आज उस समय से अधिक प्रासंगिक सिद्ध हो रहीं हैं.

"राम के भक्त रहीम के बंदे,
               रचते आज फ़रेब के फंदे.
कितने ये मक्कार ये अंधे,
                 .देख लिये इनके भी धंधे.
इन्हीं की काली करतूतों से
                        बना ये मुल्क मशान.
                कितना बदल गया इंसान।"

Saturday, August 19, 2017

फ़ोटोग्राफ़र दिवस पर स्व. गान्धी राम ' फ़ोकस' जी की याद


       आज सुबह जैसे ही मैने फ़ेसबुक पर नज़र डाली तो उरई IPTA के सचिव राज पप्पन की पोस्ट पर नज़र गयी जिसमे उन्होंने आज फ़ोटोग्राफ़र दिवस पर सभी फ़ोटोग्राफ़र भाइयों को बधाई दी थी.
        इस पोस्ट को पढ़ कर मेरा मन अपने नगर उरई के अतीत में चला गया.इस वर्ष ही मैने अपनी सेवा से अवकाश प्राप्त किया है. बचपन में आज से लगभग पचपन वर्ष पूर्व उरई के अतीत की स्मृतियॉ मानस-पटल पर आने लगीं , जब  नगर में यहाँ के माहिल तालाब के सामने दो  ही फ़ोटो स्टूडियों ही थे. पहला 'रमेश फ़ोटो स्टूडियो ' जो फ़ोटोग्राफ़र श्री रमेश चन्द्र सक्सेना का  था .वे अपने चाचा श्री गुट्टू सक्सेना व भाई श्री अवधेश चन्द्र सक्सेना के साथ बैठते थे. 
          दूसरा फ़ोटो स्टूडियो 'फ़ोकस फ़ोटो स्टूडियो 'फ़ोटोग्राफ़र श्री गान्धी राम गुप्त का था जो आज भी है.
          गॉधी राम जी हास्य व  व्यंग्य के समर्थ कवि थे. पहले उनका मूल नाम 'नाथू राम गुप्त ' था. पर जब १९४८ में नाथू राम गोडसे ने गॉधी जी की हत्या कर दी तो वे अपना नाम 'गॉधी राम ' लिखने लगे.
           फ़ोकस जी का व्यक्तित्व बडा प्रभावशाली था. गेरुआ वस्त्र व डाढी में वे एक साधु लगते थे.वे स्वयं योगासन में विश्वास करते थे और प्रसार भी.कई लोगों को योगासन सिखा कर उन्होंने उन्हें स्वास्थ्य लाभ कराया था.वे वाकई एक संत थे एवम् अत्यन्त सरल व नेक व्यक्ति  थे.
           वे अत्यन्त विनोदी स्वभाव के थे. वे हास्य एवं व्यंग्य के सशक्त हस्ताक्षर थे. होली के पर्व पर ऐतिहासिक माहिल तालाब के किनारे  'मूर्ख दिवस'  मनाने की शुरुआत उन्होने ही की थी. यह परम्परा आज भी कायम है.
          उनकी दूकान पर जाते ही विनोदी वातावरण महसूस होने लगता था. सरल शब्दों में गंभीर बात कहना उनकी विशेषता थी.अपनी दूकान के सामने उन्होने अपनी चार पंक्तियॉ लिखा रखी थीं -
    "तन,  लडकपन औ जवानी,
                     सब    धरा  रह जायेगा.
      यादगारी के लिये,
                     फोटो .फकत रह जायेगा."
         
            उनकी दूकान पर लिखी चार पंक्तियॉ भी याद आतीं हैं-
        " जैसी    फोटो ,वैसे  दाम,
                       फोटोग्राफर    गॉधीराम."

           मेरे पिता श्री के.डी.सक्सेना एवं अग्रज आदर्श कुमार 'प्रहरी' भी कवि थे.फोकस जी अक्सर उनसे मिलने घर पर आते थे. मैने उनके मुख से उनकी कुछ कवितायें सुनी हैं.
            उनके दो गीत बडे  प्रसिद्ध रहे हैं--

"यदि हम सबने अपना -अपना
                                 धर्म ,न छोडा होता,
'पुष्पक विमान की जगह,
                       आज क्यों तॉगा,घोडा होता"

(उस समय तॉगे व घोडे ही उरई में चलते थे )
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          " हे! गुम्मा    तेरा  यश  महान"

             आज फ़ोटोग्राफ़र दिवस  पर  जनपद के  इस  महान  व्यंग्यकार को शत् शत् नमन.

Tuesday, March 5, 2013

निस्पृह जी की स्मृति में

 ५ मार्च  जनपद जालौन  के प्रसिद्ध कवि स्व० श्री कृष्ण दयाल सक्सेना 'निस्पृह ' जी का निर्वाण  दिवस है ,जो अपने मूल्यों के प्रति समर्पित एक आदर्श व्यक्तित्व  के रूप में जाने जाते थे। वे हिन्दी ,अंग्रेजी संस्कृत व उर्दू भाषों में काव्य रचना करते थे । प्रस्तुत है उनकी   १९६ ८  में रचित  एक रचना-
 

........................ संघर्ष होते , उपलब्धि होती ...........................

संघर्ष होते ,  उपलब्धि   होती पराजय -विजय फ़िर प्रश्न होता
न आकाश   होते , प्रगतिशील मानव , फ़िर चंद्र पाने की आशा सँजोता ;
विज्ञान अपने प्रयोगों की निधि को , विफल्तांक में इस तरह खोता ;
अमानव होते , अवतार होते, जो कंस आता , फ़िर कृष्ण होता ;
संघर्ष होते..................................................................................( )
भगवान होते, फ़िर भक्त होते, जो साध्य होता साधक ही होते;
जो देवी होती ,उपासक होते, आराध्य होता , आराधक होते;
जो इष्ट होता , फ़िर सिद्धि होती,सफल या विफल फ़िर प्रश्न होता;
संघर्ष होते ................................................................................ ( २)
समस्या होती , हल के लिए भी ,किसी की भी साधना ही न   होती;
संकल्प होता, प्रण -पूर्ति की ही ,किसी को कभी भावना ही होती;
प्रतिष्ठा होती      , व्रत पालने के,    लिए ही कोई नर संलग्न होता ;
संघर्ष होते....................................................................................(३)
सत्कर्म होते         , सत्संग होता     , जो संत होते, होती भलाई ;
फ़िर विश्व के गर्भ से ही कभी भी     ,युगों से पनपती,   खोती बुराई;
सदगुण जो होते, ध्रुव-सत्य होता,नअन्याय का पथ कभी भग्न होता;
 न संघर्ष होते ..................................................................................( ४ )
निराशा न होती .सु-आशा  का सम्बल , न जीवन में किंचिद कभी मूल्य पाता ;
न  अस्तित्व होता कि जीवन में सुख को ,न कोई कभी क्लेश दुःख भूल पाता .;
'विषम' और 'सम' का न  जोड़ा जो  होता, न उत्साह होता ,विफल यत्न होता .
न संघर्ष होते  ...................................................................... ............(.५ )
न जो धर्म होता ,प्रभावक कभी भी,प्रयासों से अपने महामानव बनता ;
न दो चार पग भी उसे साथ देते ,कि  ' गंतव्य' से दूर हो    भीरु, थकता ;
न सक्षम ही होता,सुमानस  किसी का, न कर्त्तव्य की भावना -मग्न होता 
संघर्ष होते........................................................ .............................(.६ )
न इंगित जो  होता ,सहारा न होता,न चलता कभी भी सफल सृष्टि का क्रम ;
इशारा न होता न अम्बर-अवनि युग्म सहयोग करते ,की रहता क्षितिज-भ्रम ;
सुनिर्मल, सबल ने सँभाला न होता , भले    उच्चतम हो ,   महा   निम्न होता .
न संघर्ष होते……………....................................................................(७)
न सौजन्य होता ,न दुर्जन सुधरते , न साफल्य  होता, विफल-जन संभलते ;
न व्यक्तित्व होता ,न नर-श्रेष्ठ होते ,अडिग साधना से ,न भ्रम को बदलते ;
न सौन्दर्य होता, न गरिमा ही दिखती ,अशोभा    ही होती ,सभी नग्न होता ;
न संघर्ष होते ........................................................................................(८)
 

Thursday, September 15, 2011

गोपाल कृष्ण सक्सेना 'पंकज' की ग़ज़ल

पृष्ठ सारा भर गया
पृष्ठ सारा भर गया , बस हाशिया बाकी रहा ,
जिंदगी मैं मौत का ही काफिया बाकी रहा
अक्षरों के वंश में अब ताजपोशी के लिये ,
शिष्टता के नाम पर बस शुक्रिया बाकी रहा
जिंदगी हिस्से की अपनी,हम कभी के जी लिये ,
साँस ही लेने का अब तो सिलसिला बाकी रहा
मौत आई थी हमें लेने मगर जल्दी में थी ,
बोरिया तो ले गयी पर बिस्तरा बाकी रहा
लोग मिलते हैं हमें कोने -फटे - ख़त की तरह ,
गम गलत करने को केवल डाकिया बाकी रहा


शिव लगे सुन्दर लगे
शिव लगे, सुन्दर लगे , सच्ची लगे ,
बात कुछ ऐसी कहो , अच्छी लगे
मुद्दतों से मयकदों में बंद है ,
अब ग़ज़ल के जिस्म पर मिटटी लगे
गीत प्राणों का उपनिषद् था कभी ,
अब महज बाजार की रद्दी लगे
रक्स करती देह उनकी ख्वाब में ,
तैरती डल झील की रद्दी लगे
जुल्फ के झुरमुट में बिंदिया आपकी ,
आदिवासी गाँव की बच्ची लगे
याद माँ की उँगलियों की हर सुबह,
बाल में फिरती हुई कंघी लगे
जिंदगी अपनी समय के कुम्भ में ,
भीड़ में खोयी हुई लड़की लगे
जिस्म 'पंकज ' का हुआ खँडहर मगर,
आँख में बृज भूमि की मस्ती लगे

Sunday, August 7, 2011

गोपाल कृष्ण सक्सेना 'पंकज' की ग़ज़ल


बुन्देलखंड के जालौन (उरई )के मूल निवासी एवं मध्य प्रदेश छिदवाडा में अंगेजी साहित्य के प्रोफ़ेसर स्व ० गोपाल कृष्ण सक्सेना 'पंकज ' हिंदी साहित्य का एक चिर परिचित नाम है। मध्य प्रदेश के साहित्यिक परिवेश में उनका बड़ा सम्मान था । उनकी सुमधुर स्वर लहरी कवि सम्मेलनों में एक अनोखा समां बाँध देती थीं. साहित्य जगत उन्होंने हिंदी ग़ज़ल को एक नई पहचान दी है । प्रस्तुत है उनकी एक ग़ज़ल -
हिंदी ग़ज़ल
उर्दू की नर्म शाख पर रुद्राक्ष का फल है ,
सुदर को शिव बना रही हिंदी ग़ज़ल है
इक
शाप ग्रस्त प्यार में खोयी शकुंतला,
दुष्यंत को बुला रही हिंदी ग़ज़ल है ,
ग़ालिब के रंगे शेर में ,खय्याम के घर में,
गंगाजली उठा रही हिंदी ग़ज़ल है
फारस की बेटियां है अजंता की गोद में ,
सहरा में गुल खिला रही हिंदी ग़ज़ल है
आँखों में जाम , बाँहों में फुटपाथ समेटे ,
मिटटी का सर उइहा रही हिंदी ग़ज़ल है
जिस रहगुज़र पर मील के पत्थर नहीं गड़े ,
उन पर नज़र गडा रही ,हिंदी ग़ज़ल है
गिनने लगी है उँगलियों पे दुश्मनों के नाम,
अपनों को आजमा रही हिंदी ग़ज़ल है
सुख-दुःख ,तलाश ,उलझनें ,संघर्ष की पीड़ा ,
सबको गले लगा रही हिंदी ग़ज़ल है
पंकज ने तो सौ बार कहा दूर ही रहना,
होठों पे फिर भी रही हिंदी ग़ज़ल है